रूस और यूक्रेन के बीच दसवें दिन भी जुंग जारी है। रूस के यूक्रेन पर हमला करने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई तरह के व्यवधान उत्पन्न हो गए हैं। सभी देश मौजूदा घटनाक्रम से निपटने के लिए अपने-अपने हितों को देखते हुए अपने स्टैंड तय कर रहे हैं।

एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भारत ने अपने सामरिक हितों को ध्यान में रखते हुए यूक्रेन और रूस के विवाद पर अपना निष्पक्ष रवैया कायम रखा है। रूस के यूक्रेन पर हमले की निंदा करने वाली संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रस्तावों को लेकर हुई वोटिंग में भारत अनुपस्थित रहा। भारत का रूख स्पष्ट है कि संवाद ही मतभेदों और विवादों को खत्म करने का एक मात्र तरीका है।

यूक्रेन से भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए भारत ‘ऑपरेशन गंगा’ चला रहा है और इसके लिए दोनों ही देशों से मोदी सरकार लगातार संपर्क में है। ये भारत की नीति का ही परिणाम है। भारत वह पहला देश है जो बिना किसी सैन्य हस्तक्षेप के अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराने में में पूरी तरह से कामयाब रहा।

भारत में मौजूद कुछ लिबरल समूह के कुछ लोग निराशा से घिरते हुए नजर आ रहे हैं। उन्हें यह बात हजम नहीं हो रही है कि भारत रणनीतिक अखंडता की रक्षा कर सकता है। कोई भी निर्णय लेने के लिए पश्चिमी मुल्क भारत पर दवाब नहीं बना सकते। यह समूह भारत के सहयोगी अमेरिका को भारत पर कारवाई करने के लिए उकसाने का प्रयास कर रहे हैं।

शुक्रवार को एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन भारत में अमेरिका मिशन की प्रतिनिधि पेट्रीसिया एलसीना से एक इंटरव्यू के दौरान, यूक्रेन रूस विवाद पर भारत के निष्पक्ष रूख और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर मतदान के दौरान भारत की अनुपस्थिति को लेकर एलसीना को केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए उकसाते नजर आए।

एनडीटीवी के पत्रकार ने पूछा कि क्या बाइडेन प्रशासन यूक्रेन रूस विवाद पर भारत के रूख को लेकर निराश है? क्योंकि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका समर्थित प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया। श्रीनिवासन जैन द्वारा उकसाने वाले सवाल पूछे जाने के बावजूद एलसीना का जवाब सकारात्मक रहा। उन्होंने भारत के खिलाफ किसी भी तरह की टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका इस बात को समझता है कि रूस के साथ भारत के संबंध, रूस के साथ अमेरिका के संबंधों से काफी अलग हैं। बायडेन प्रशासन ने यूक्रेन रूस विवाद पर भारत के रूख को लेकर कभी भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं की है।

अमेरिका द्वारा यह बार बार स्पष्ट किया जा चुका है कि वो अब भारत को दिशानिर्देश नहीं देने की स्थिति में नहीं है। यह स्पष्ट होने के बाद भी वामपंथी धारा के लोग अमेरिका को भारत पर कड़ा रूख अख्तियार करने के लिए उकसाने का हर तरह से प्रयास करते रहते हैं।

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